केन्द्रीय जल आयोग की प्रमुख गतिविधियां
केन्द्रीय जल आयोग का सामान्य उत्तरदायित्व बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई, नौवहन, पेयजल आपूर्ति तथा जल विद्युत उत्पादन के लिए संबंधित राज्य में जल संसाधनों के नियंत्रण, संरक्षण तथा उपयोग की योजनाओं को संबंधित राज्य सरकारों के परामर्श से शुरू करना, समन्वित तथा आगे बढ़ाना और यदि आवश्यक हो, तो किसी योजना का निर्माण एवं निष्पादन प्रारंभ भी कर सकता है। उपर्युक्त उत्तरदायित्वों के निर्वहन हेतु केन्द्रीय जल आयोग के निम्नलिखित प्रमुख कार्य हैं:-
1. विद्युत उत्पादन, गुरूत्व प्रवाह अथवा लिफ्ट द्वारा सिंचाई,
बाढ़ प्रबंधन, पर्यावरणीय प्रबंधन, पुनर्वास एवं पुनःस्थापना, मृदा
संरक्षण, जल-भराव रोधी उपायों, क्षारीय तथा लवणीय भूमि उद्धार,
जलनिकास एवं पेयजल आपूर्ति के संबंध में नदी घाटियों के विकास हेतु
डिजाइन एवं योजनाएं तैयार करने के लिए जब भी आवश्यक हो, आवश्यक
सर्वेक्षण एवं अन्वेषण करना ;
2. भारत सरकार अथवा संबंधित राज्य सरकार की ओर से किसी भी नदी घाटी
विकास योजना का निर्माण कार्य शुरू करना ;
3. विशिष्ट क्षेत्रों अथवा अंचलों के लिए नदी घाटी एवं विद्युत
विकास योजनाओं के अन्वेषण, सर्वेक्षण तथा तैयारी में जब भी आवश्यक
हो, राज्य सरकारों (गठित किए गए आयोगों, निगमों या बोर्डें) को
सलाह एवं सहायता प्रदान करना ;
4. जल संसाधन विकास, विभिन्न राज्यों के मध्य अधिकार एवं विवाद, जो
संरक्षण एवं उपयोग की किसी योजना को प्रभावित करते हैं, के संबंध
में तथा नदी घाटी विकास से संबंधित कोई मामला, जो आयोग को प्रस्तुत
किया जाए, के संबंध में भारत सरकार को सलाह प्रदान करना ;
5. जल संसाधनों के बेसिन-वार विकास के संबंध में भारत सरकार तथा
संबंधित राज्य सरकारों को सलाह प्रदान करना ;
6. अन्तर्राज्यीय जल विवादों से संबंधित सभी मामलों में भारत सरकार
को सलाह प्रदान करना ;
7. ज्वारीय नदियों, वर्षा, अपवाह एवं तापमान, जलाशयों में गाद भरना,
जलीय संरचनाओं का व्यवहार, पर्यावरणीय पहलू आदि से संबंधित आंकड़े
एकत्र करना, संग्रह का समन्वय, प्रकाशन एवं विश्लेषण करना तथा इन
मामलों के संबंध में केन्द्रीय सूचना ब्यूरो के रूप में कार्य करना
;
8. समूचे भारत में जल की गुणवत्ता सहित जल संसाधन एवं इसके उपयोग
संबंधी सांख्यिकीय आंकड़े एकत्रित, रख-रखाव एवं प्रकाशित करना तथा
जल संसाधन के संबंध में केन्द्रीय सूचना ब्यूरो के रूप में कार्य
करना ;
9. नदी घाटी विकास के सभी पहलुओं संबंधी योजनाएं शुरू करना तथा
भारत और विदेश में भारतीय इंजीनियरों के प्रशिक्षण के लिए व्यवस्था
करना ;
10. उपकरणों, प्रेक्षक के तरीकों तथा अभिलेख, निर्माण सामग्री,
सिंचाई परियोजनाओं के डिजाइन एवं कार्यविधि का मानकीकरण करना ;
11. सिंचाई के सतत विकास हेतु सिंचाई परियोजनाओं के
सामाजिक-कृषि-आर्थिक एवं पारिस्थितिकी पहलुओं का अध्ययन शुरू करना
;
12. नदी घाटी विकास योजनाओं के विभिन्न पहलुओं जैसे बाढ़ प्रबंधन,
सिंचाई, नौवहन, जल विद्युत विकास इत्यादि तथा संबद्ध संरचनात्मक एवं
डिजाइन विशिष्टताओं पर अनुसंधान करना एवं उसे समन्वित करना ;
13. आधुनिक आंकड़ा संग्रह तकनीकों जैसे जल संसाधन विकास हेतु दूरस्थ
संवेदन तकनीकी एवं नदी पूर्वानुमान और कम्प्यूटर साफ्टवेयर के
विकास को बढ़ावा देना ;
14. विद्यमान तथा भविष्य में बनने वाले बांधों के बांध सुरक्षा
पहलुओं पर अध्ययन करना और बांध सुरक्षा उपायों के साधनों का
मानकीकरण करना ;
15. नदी व्यवहार, विनाश कटाव/तटीय कटाव समस्याओं को स्पष्ट करने के
लिए रूपतामक अध्ययन शुरू करना और इन सभी मामलों में केन्द्र तथा
राज्य सरकारों को सलाह प्रदान करना ;
16. जल संसाधनों के किफायती एवं इष्टतम उपयोग को बढ़ावा देने संबंधी
परीक्षण, अनुसंधान तथा ऐसी अन्य गतिविधियां शुरू करना ; और
17. जल संसाधन विकास, उपयोग तथा संरक्षण के क्षेत्र में देश में
हुई प्रगति एवं उपलब्धियों के विषय में जनजागरूकता उत्पन्न करना तथा
उसे बढ़ावा देना।